महाशिवरात्री 2025 की पूर्व संध्या पर मैं यह कथा लिखने जा रहा हूँ,प्रयागराज में महाकुंभ 2025 का भी समापन महाशिवरात्री पर हो जाएगा,मुझे गंगा अवतरण की कहानी या कथा के लिए यह उपयुक्त समय लगा ।
सभी भक्तों का सनातन संवाद में स्वागत है,पंडित योगेश वत्स की तरफ से सबको राम राम,हर हर महादेव । सभी भक्तों को महाशिवरात्री की शुभकामनायें ।
वैसे तो सभी को भागीरथ प्रयास,भागीरथ की तपस्या और शिव की जटाओं से माँ गंगा अवतरण की कहानी ज्ञात ही है लेकिन आज मैं इस कथा को पुराण के अनुसार विस्तार से लिखूंगा । साथ ही उस स्त्रोत का हिन्दी अनुवाद भी दूँगा जिस स्त्रोत के माध्यम से भागीरथ ने भगवान शिव की तपस्या और आराधना की थी साथ यह भी बताऊंगा की भागीरथ ने किस के कहने पर या किस की सलाह पर यह तपस्या की थी, इसलिए सभी भक्तों से अनुरोध है कि आप धैर्य से लेख के अंत तक बने रहें ।
महाशिवरात्रि के विशेष अवसर पर अगर भागीरथ द्वारा की गई प्रार्थना आप भी भोलेनाथ को सुनाते हैं तो हो सकता है आप की भी कोई मनोकामना पूर्ण हो जाये,मैंने इस स्त्रोत का हिन्दी अनुवाद ही यहाँ दिया है जिसे बस आप को भाव सहित पढ़ना है ।
गंगा अवतरण की कहानी : महाशिवरात्री 2025 विशेष
नारद जी का श्री सनक जी से प्रश्न :
मुनि हिमालय पर्वत पर जाकर राजा भगीरथ ने क्या किया ? वह गंगा जी को किस प्रकार ले कर आए ? यह मुझे बताने की कृपा करें
श्री सनक जी का उत्तर :
मुने, महाराज भगीरथ जटा और चीर धारण करके तपस्या के लिए हिमालय पर जाते हुए गोदावरी नदी के तट पर पहुंचे वहां उन्होंने महान वन में महर्षि भृगु का उत्तम आश्रम देखा वहां चारों ओर भांति भांति के फूल खिले हुए थे, ऋषि मुनियों का समुदाय वहां निवास करता था, वेदों और शास्त्रों का महान घोष आकाश में गूंज रहा था महर्षि के ऐसे आश्रम में राजा भागीरथ ने प्रवेश किया ।
भृगु ऋषि उस समय परम ब्रह्म के स्वरूप का वर्णन कर रहे थे शिष्यों की मंडली उन्हें घेर कर बैठी थी । तेज में वह भगवान सूर्य के समान थे राजा भगीरथ ने वहां उनका दर्शन किया और उनके चरण वंदन कर उन ब्राह्मण शिरोमणि की वंदना की साथ ही भृगु जी ने भी सम्मानपूर्वक राजा का आतिथ्य सत्कार किया ।
महर्षि के द्वारा अतिथि सत्कार हो जाने पर राजा भगीरथ उन मुनीश्वर से हाथ जोड़कर विनय पूर्वक बोले : भगवान आप सब धर्म के ज्ञाता तथा संपूर्ण शास्त्रों के विद्वान हैं, मैं संसार बंधन से डर कर आपसे मनुष्यों के उद्धार का उपाय पूछता हूं सर्वज्ञ मुनिसत्यम यदि मैं आपका कृपा प्राप्त होऊँ तो जिस कर्म से भगवान संतुष्ट होते हैं वह मुझे बताइए।
भृगु ऋषि ने कहा :
राजन तुम्हारी मनोकामना क्या है यह मुझे मालूम हो गई है तुम पूरी आत्माओं में श्रेष्ठ हो अन्यथा अपने समस्त कुल का उद्धार करने की योग्यता तुम्हारे मन मैं कैसे आती राजन जो कोई भी क्यों ना हो, यदि वह शुभ कर्म के द्वारा अपने कुल के उद्धार की इच्छा रखता है तो उसे नर रूप में साक्षात् नारायण ही समझना चाहिए ।
राजन जिस कर्म से प्रसन्न होकर देवेश्वर भगवान विष्णु मनुष्यों को अभीष्ट फल प्रदान करते हैं वह बतलाता हूं एकाग्रचित होकर सुनो ।
राजन तुम सदा सत्य का पालन करो, अहिंसा, धर्म में स्थित रहो, सदा संपूर्ण प्राणियों के हित में लगे रहकर कभी भी झूठ ना बोलो, दुष्टों का साथ छोड़ दो, हमेशा सत्संग करो, पुण्य करो और दिन रात सनातन भगवान विष्णु का स्मरण करते रहो
भगवान महा विष्णु की पूजा करो और उत्तम शांति का आश्रय लो द्वादशाक्षर अथवा अष्टाक्षर मंत्र जपो इस से तुम्हारा कल्याण होगा ।
( हालांकि राजा भागीरथ ने भृगु ऋषी से सत्य,अहिंसा,धर्म और मंत्रों के तत्वों को समझने के लिए फिर से प्रश्न किया और ऋषी ने उन्हे विस्तार से समझाया भी लेकिन मैं इस लेख में उन उत्तरों पर नहीं जाऊंगा क्योंकि लेख भी बड़ा होगा और गंगा अवतरण की कहानी से विषयांतर भी होगा,इस विषय पर किसी अगले लेख में चर्चा करूंगा । )
अभी गंगा अवतरण की कहानी पर ही रहता हूँ ।
भागीरथ अपने पित्रों की मुक्ति के लिए साधन जानने के बाद तपस्या के लिए वन को चले जाते हैं,आइये उस तपस्या के बारे में जानते हैं ।
भागीरथ ने कैसे और कितने सालों तक की तपस्या ?

हिमालय पर्वत पर पहुंचकर वहां के मनोहर पवित्र प्रदेश में स्थित नागेश्वर महादेव क्षेत्र में उन्होंने अत्यंत कठिन तपस्या की ।
राजा तीनों काल स्नान करते कंदमूल तथा फल खाकर रहते और उसी से आए हुए अतिथियों का सत्कार भी करते थे । वह प्रतिदिन हवन में तत्पर रहते ।
उन्होंने भगवान नारायण की शरण ले रखी थी पत्र, पुष्प फल और जल से तीनों काल श्री हरि की आराधना करते थे इस प्रकार अत्यंत धैर्य पूर्वक भगवान नारायण का ध्यान करते हुए वह सूखे पत्ते खाकर रहने लगे इसके बाद परम धर्मात्मा राजा भगीरथ ने प्राणायाम करते हुए सांस बंद करके तपस्या करना प्रारंभ किया ।
जिनका कहीं अंत नहीं है, जो किसी से पराजित नहीं होते, उन्हीं श्री नारायण भगवान का चिंतन करते हुए वह साठ हजार वर्षों तक सांस रोक रहे जिससे राजा की नाक के छिद्र से भयंकर अग्नि प्रकट हुई उसे देखकर सब देवता भयभीत होने लगे ।
भयभीत होकर देवताओं ने भगवान विष्णु की स्तुति की और भगवान के प्रगट होने पर अपने भय का कारण बताया । परम प्रभु ने सभी देवताओं को चिंताओं से मुक्त करते हुए उन्हे अभय कर उन्हे भरोसा दिलाया । इसके बाद विष्णु भगवान उस स्थान पर गए जहां राजा भागीरथ तपस्या कर रहे थे ।
राजा भागीरथ को विष्णु भगवान का दर्शन :

संपूर्ण जगत के गुरु,शंख, चक्रधारी सच्चिदानंद स्वरुप भगवान श्री हरि ने राजा भगीरथ को प्रत्यक्ष दर्शन दिया राजा ने देखा ……..
सामने कमल नयन भगवान विराजमान है उनके प्रभाव से संपूर्ण ब्रह्मांड प्रकाशित हो रहा है, उनके अंगों की क्रांति अलसी के फूल की भांति श्याम है, कानों में झिलमिलाते हुए कुंडल उनकी शोभा बढ़ा रहे हैं, मस्तक पर जगमगाता हुआ मुकुट उनके स्वरूप को और भी प्रकाश से भर दे रहा है । उनके वक्ष स्थल में श्री वत्स का चिन्ह और कौस्तभ मणि है, वह वर्णमाला से विभूषित है, उनकी भुजाएं बड़ी-बड़ी है, अंग अंग से उदारता टपक रही है, उनके चरण कमल ब्रह्मा जी के द्वारा पूजित हैं ।
भगवान की यह झांकी देखकर राजा भगीरथ ने भूतल पर दंडवत की, वो बार-बार प्रणाम करने लगे उनका हृदय अत्यंत हर्ष से भरा हुआ था, शरीर में रोमांच हो आया और वह गदगद कंठ से कृष्णा, कृष्णा, श्री कृष्णा इस प्रकार उच्चारण कर रहे थे अंतर्यामी जगतगुरु भगवान विष्णु, भागीरथ पर प्रसन्न थे और भूत भावन भगवान ने करुणा से भरकर कहा :
महा भाग्यशाली भागीरथ तुम्हारा अभीष्ट सिद्ध होगा । तुम्हारे पूर्व पितामह मेरे लोक में जाएंगे । हे राजन …
“भगवान शिव मेरे दूसरे स्वरूप हैं, तुम यथाशक्ति स्तुति पाठ करके उनका स्तवन करो वह तुम्हारा संपूर्ण मनोरथ तत्काल सिद्ध करेंगे, जिन्होंने अपनी शरण में आए हुए चंद्रमा को स्वीकार किया है वह बड़े शरणागत वत्सल है अतः स्त्रोत्रों द्वारा स्तवन करें, उन सुखदाता ईशान कि तुम आराधना करो, अनादि अनंत देव महेश्वर संपूर्ण कामनाओं तथा फलों के दाता है, राजन तुमसे भली भांति पूजित होकर वे शीघ्र तुम्हारा कल्याण करेंगे।”
इतना कहकर तीनों लोकों के स्वामी देव देव देवेश्वर भगवान अंतर्ध्यान हो गए ।
राजा भागीरथ को विश्वास नहीं हो रहा था की यह सत्य में हुआ था या सपना था तभी आकाशवाणी होती है ” राजन यह अवश्य ही सत्य है,तुम चिंता ना करो ”
यह सुनकर राजा भागीरथ हम सब के कारण देवों के देव सभी देवताओं के स्वामी महादेव का स्तवन करने लगे ।
( भक्तों के स्तवन के लिए उसी भागीरथ स्त्रोत को जिससे माँ गंगा का अवतरण इस धरती पर हुआ उसको हिन्दी में दिया जा रहा है,शिव की आराधना के लिए यह स्त्रोत बहुत फलदायी है, सभी शिव भक्तों को श्रद्धा भाव से इसका स्तवन करना चाहिए । )
राजा भागीरथ द्वारा गंगा अवतरण के लिए की गई शिव स्तुति हिन्दी में :
मैं प्रणतजनों की पीड़ा का नाश करने वाले विश्वनाथ शिव को प्रणाम करता हूं ।
जो प्रमाण से परे और प्रमाण रूप है उन भगवान ईशान को मैं नमस्कार करता हूं ।
जो जगत स्वरूप होते हुए भी नित्य और अजन्मा है संसार की सृष्टि संघार और पालन के एकमात्र कारण है उन भगवान शिव को में प्रणाम करता हूं ।
योगीश्वर, महात्मा जिनका आदि मध्य और अंत से रहित अनंत, अजन्मा एवं अव्यय रूप से चिंतन करते हैं उन पुष्टि वर्धक शिव को मैं प्रणाम करता हूं ।
पशुपति भगवान शिव को नमस्कार है ।
चेतन स्वरूप भगवान शंकर को नमस्कार है ।
असमर्थों को सामर्थ देने वाले शिव को नमस्कार है ।
समस्त प्राणियों के पालक भगवान भूतनाथ को नमस्कार है ।
प्रभु आप हाथ में पिनाक धारण करते हैं आपको नमस्कार है ।
त्रिशूल से शोभित हाथ वाले आपको नमस्कार है ।
संपूर्ण भूत आपके स्वरूप हैं आपको नमस्कार है ।
जगत के अनेक रूप आपके ही रूप है आप निर्गुण परमात्मा को नमस्कार है ।
ज्ञान स्वरूप आपको नमस्कार है ।
ध्यान के साक्षी आपको नमस्कार है ।
ध्यान में सम्यक रूप से स्थित आपको नमस्कार है ।
ध्यान से ही अनुभव में आने वाले आपको नमस्कार है ।
जो अपने ही प्रकाश से प्रकाशित होने वाले महात्मा परम ज्योति स्वरूप तथा सनातन है,तत्वज्ञ पुरुष जिन्हे मानव नेत्रों को प्रकाश देने वाले सूर्य कहते हैं, जो उमाकांत नंदकेश्वर नीलकंठ सदाशिव , मृत्युंजय , महादेव परात्पर्य एवं विभु कहे जाते हैं, परम ब्रह्म शब्द ब्रह्म जिनके स्वरूप हैं, उन समस्त जगत के कारण भूत परमात्मा को मैं प्रणाम करता हूं ।
प्रभु आप जटा जूट धारण करने वाले हैं आपको नमस्कार है ।
जिसे समुद्र, नदियां, पर्वत, गंधर्व, यक्ष, असुर, सिद्ध समुदाय, स्थावर जंगम, बड़े -छोटे ,सत्य तथा जड़ और चेतन सबका प्रादुर्भाव हुआ है, योगी पुरुष जिनके चरणारबिंदो में नमस्कार करते हैं, जो सबके अंतरात्मा रूपहीन एवं ईश्वर है उन स्वतंत्र एक तथा गुड़ियों के गुण स्वरूप भगवान शिव को मैं बार-बार प्रणाम करता हूं । बार-बार मस्तक झुकता हूं ।
राजा भागीरथ को महादेव के दर्शन :

सब लोगों का कल्याण करने वाले महादेव भगवान शंकर इस प्रकार अपनी स्तुति सुनकर जिनकी तपस्या पूर्ण हो चुकी है उन राजा भगीरथ के आगे प्रकट हुए……
उनके पांच मुख और दस भुजाएं हैं, उन्होंने अर्ध चंद्र का मुकुट धारण कर रखा है, उनके तीन नेत्र हैं, एक-एक अंग से उदारता टपकती है उन्होंने सर्प का यघ्योपवीत पहन रखा है उनके वक्ष स्थल विशाल तथा कांति हिमालय के समान उज्जवल है, गजचर्म का वस्त्र पहने हुए उन भगवान शिव के चरणारविंद समस्त देवताओं द्वारा पूजित हो रहे हैं ।
भगवान शिव को इस रूप में उपस्थित देख राजा भगीरथ उनके चरणों के आगे दंड की भांति पृथ्वी पर गिर पड़े फिर सहसा उठकर उन्होंने भगवान के सम्मुख हाथ जोड़ और उनके महादेव तथा शंकर आदि नाम का कीर्तन करते हुए प्रणाम किया ।
राजा की भक्ति जानकर चंद्रशेखर भगवान शिव उनसे बोले ” राजन मैं बहुत प्रसन्न हूं तुम इच्छा अनुसार वर मांगो, तुमने स्त्रोत और तपस्या द्वारा मुझे भली भांति संतुष्ट किया है ”
भगवान शिव के ऐसा कहने पर राजा भागीरथ का हृदय प्रसन्नता से खिल उठा और वह हाथ जोड़कर जगदीश्वर से इस प्रकार बोले ” महेश्वर यदि मैं वरदान देकर अनुप्रीत करने योग्य होऊँ तो हमारे पितरों की मुक्ति के लिए आप हमें गंगा प्रदान करें”
भगवान शिव बोले ” राजन….. मैंने तुम्हें गंगा दे दी इससे तुम्हारा पितरों का उत्तम गति प्राप्त होगी और तुम्हें भी परम मोक्ष मिलेगा यह कहकर भगवान शिव अंतर्ध्यान हो गए ।”
भक्तो यह थी माँ गंगा के अवतरण की कहानी,जो भी भक्त इस कथा के अंत तक साथ रहे हैं उन सभी भक्तों को महादेव की कृपा प्राप्त हो उनकी मनोकामना भोले बाबा पूरी करें ।
कथा के बारे में अपनी राय कमेन्ट में दे सकते हैं कोई सुझाव हो तो जरूर लिखें ।
हर हर गंगे । हर हर महादेव । काशी विश्वनाथ की जय हो ।
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