
Yogmaya Mandir : एक ऐसा मंदिर जिसके बारे में मान्यता है कि महाभारत काल में आज से लगभग 5000 साल पहले भगवान कृष्ण ने पांडवों के साथ यहाँ पूजा की थी तभी इसका स्थापना काल माना जाता है । योगमाया जिन्हें माँ जोगमाया के रूप में भी जाना जाता है भगवान कृष्ण की बहन थीं ऐसी भी मान्यता है ।
आज 23/06/2023 रात्रि 11 बजे जब मैंने यह लेख लिखना प्रारम्भ किया है,इस समय गुप्त नवरात्रि की पंचमी तिथि है और शुक्रवार का दिन है जो स्वयं माँ का दिन है । यह माँ की ही प्रेरणा है जो आज इस लेख का उन्होने समय नियत किया जबकि मैं माता जी के दर्शन को 5 जून को गया था तब से इस लेख का समय आगे बढ़ता जा रहा था ।
मैं पंडित योगेश वत्स सभी सनातनी भाई बहनों का धर्म,संस्कृति और भारतीय सभ्यता के इस ब्लाग पर आपका बहुत बहुत स्वागत करता हूँ ।
मेरे पहले दर्शन : My First Visit Of Yogmaya Mandir :
इस लेख की नींव आज से लगभग चार साल पहले पड़ी थी जब मैं इस Yogmaya Mandir : को खोजते खोजते :माँ के दर्शन को पहुंचा था । मंदिर के बारे में विस्तार से बताने के पहले यह चर्चा मुझे आवश्यक लगी क्योंकि मुझे पहले ही दर्शन में माँ की सत्ता का भी आभास हुआ था और उनका आशीर्वाद भी प्राप्त हुआ था ।
आपको बताता चलूं यह Yogmaya Mandir: मंदिर भारत की राजधानी दिल्ली के महरोली क्षेत्र में कुतुबमीनार परिसर के पास में स्थित है ।
…. तो मैं अपने पहले दर्शन की बात कर रहा था । मैं जब भी किसी शहर में होता हूँ तो जब भी समय होता है तो पुराने मंदिरों को खोजता रहता हूँ । ऐसे ही जब चार साल पहले एक दिन दिल्ली में मेरे पास समय था तो नेट पर पुराने देवी के मंदिर खोज रहा था सौभाग्य से मुझे यह मंदिर नेट पर दिखा, बहुत से लोगों की तरह मैंने भी इस मंदिर के बारे में नहीं सुना था ।
नेट पर यह मंदिर कुतुबमीनार मेट्रो स्टेशन के पास दिख रहा था तो मैं मेट्रो से कुतुबमीनार मेट्रो स्टेशन पहुंच गया वहाँ से बाहर निकल कर पूछा तो बताने वाला शायद समझ नहीं पाया और उसने गलत रास्ते भेज दिया मैं पैदल ही बढ़ता हुआ जब उस स्थान पहुंचा तो वह स्थान जैन समुदाय का तीर्थ माने जाने वाला दादावाड़ी जैन मंदिर निकला । मंदिर तो मंदिर होता है तो मैंने वहाँ दर्शन किए शायद किसी जन्म में बोला होगा जो अधूरा रहा होगा जो इस जनम में पूरा होना था । दादावांडी जैन मंदिर बहुत ही सुंदर और स्वेतांबर जैन लोगों का पवित्र स्थल है ।
वहाँ से निकलने के बाद सीधा कैब की (अब और पैदल चलने की हिम्मत नहीं थी ) Yogmaya Mandir : के लिए, मंदिर पास ही था तो उसने 100 रुपये ले कर पहुंचा दिया ।
माँ का आशीर्वाद कैसे मिला वो बताने के लिए ही मैंने ऊपर का वर्णन किया नहीं तो सीधा लेख पर ही आता । हुआ यूं की मैं जब आराम से माँ के दर्शन कर चुका और कुछ समय उनके सानिध्य में आँख बंद कर बैठ भी लिया, उसके बाद जैसे ही मंदिर के मुख्य भवन से बाहर आया तो एक सज्जन ने मेरा अभिवादन किया और पूछा कहाँ जाना है ? मैं थोड़ा अचरज में पड़ा कि ना तो मेरे वेषभूषा बाबा की, ना पंडित की मैं सामान्य ही दिख रहा था तो इतनी भीड़ में उसने मुझसे क्यों पूछा ? दिल्ली में इस तरह की सहजता से कोई मदद को आगे आए ऐसे मेरे पुराने अनुभव नहीं थे ।
उसने तब तक दोबारा पूछ दिया ? कहाँ चलेंगे आप ? मैं आप को छोड़ देता हूँ ।
ना चाहते हुए भी मेरे मुंह से ज़बाब निकल गया , पास के मेट्रो तक जाना है ?
आइये मेरे साथ गाड़ी में आइये मैं आपको मेट्रो तक छोड़ देता हूँ । फिर मैंने कुछ कहा नहीं उन सज्जन के साथ हो लिया ।
रास्ते में गाड़ी में मैंने बस इतना पूछा कि आप को क्या इस तरफ आना था ? वो बोले नहीं , मुझे दूसरी तरफ जाना है,लेकिन आप को छोड़ देता हूँ ।
वो सज्जन मुझे मेट्रो पर छोड़ कर जा चुके थे । मैं खड़ा खड़ा सोच रहा था कि माँ की ममता कोई तुलना नहीं की जा सकती । मंदिर जाते समय मैं भटक गया था तो माँ को दया आयी और उन्होने अपने बंदे को भेजा कि मैं फिर परेशान ना हो जाऊँ ।
अप इसे इत्तिफ़ाक भी कह सकते हो, मैं तो माँ की करुणा और आशीर्वाद ही कहूँगा ।
Yogmaya Mandir : पुजारी जिन्हें बारीदार कहते हैं ।

इस बार जब मैं 5 जून को दोबारा गया तो मैं दर्शन के साथ साथ ही इस लेख के लिए लेखन सामिग्री भी जुटाने को गया था , जाते समय यही सोच रहा था कि मुझे कोई मंदिर के पुराने पुजारी मिल जाएँ जिनसे कि मंदिर के बारे में सही तथ्य जुटा सकूँ । लेकिन मन में शंका थी कि पता नहीं कोई पुजारी इतना समय देंगे भी कि नहीं ?
दोपहर का समय था मंदिर पहुंचा दर्शन किए,जो पुजारी माँ की सेवा में बैठे थे वो युवा थे पंडित की सामान्य वेशभूषा में थे पढ़े लिखे थे,मैने अपना उद्देश्य बताया तो वह सहर्ष ही मुझे सब बताने के लिए तैयार हो गए जिसके लिए मैं उनका दिल से बहुत ही आभारी हूं उनका नाम श्री चेतन वत्स था ।
उन्होंने बताया यहां जो भी पुजारी हैं वो सब एक ही परिवार से हैं और कई सताब्दियों से मां योगमाया की सेवा में लगे हुए हैं सभी वत्स गोत्र के ब्राह्मण हैं ( ये फिर से संयोग था क्या ? मैं इस ब्लाग का लेखक भी वत्स गोत्री ब्राह्मण हूं।क्या मां ने मुझे भी इसी लिए चुना ? )
वत्स जी ने बताया कि परिवार बड़े हो गए है इसलिए सभी परिवारों को बारी बारी से पूजा या मां की सेवा का मौका मिलता है इसलिए इनको पुजारी ना कहकर सभी लोग बारीदार कह कर बुलाते हैं ।
एक परिवार 5 से 7 साल तक सेवा करता है फिर दूसरे परिवार की बारी आती है ।
Yogmaya Mandir : पौराणिक इतिहास और मान्यताएं ।
माँ योगमाया को भगवान कृष्ण की बहन माना जाता है । भगवान कृष्ण के जन्म की कथा तो सभी को मालूम है इसलिए उसके विस्तार में नहीं जाऊंगा । जिस समय देवकी के गर्भ से भगवान कृष्ण अवतरित हुए ठीक उसी समय वृन्दावन में नन्द बाबा और यशोदा के यहाँ एक कन्या का जन्म हुआ, भगवान कृष्ण के अवतरित होने से पहले विष्णु भगवान ने देवकी और वासुदेव को अपने अवतरित होने के साथ ही यह पूर्व सूचना भी दी थी कि इसी समय नन्द बाबा के यहाँ कन्या का जन्म होगा उस कन्या को वासुदेव को मथुरा लाना था और बालक कृष्ण को यशोदा के पास छोड़ कर आना था । यही कन्या जो कृष्ण भगवान के साथ नन्द और यशोदा के यहाँ पैदा हुई थी यही माँ योगमाया थीं, इन्ही को भगवान कृष्ण की बहन माना जाता है ।
वासुदेव ने जब जेल के अंदर अपनी आठवीं संतान बता इस कन्या को कंस को सोंपा,कंस ने जब इस कन्या को पत्थर की शिला पर हत्या के लिए पटकना चाहा तो वह हाथ से छिटक गई क्योंकि वह महाशक्ति के रूप में प्रगट हुईं कृष्ण की बहन योगमाया थीं इन्ही योगमाया ने कंस को जाते जाते बोला था कि तू मुझे क्या मार रहा है तुझे मारने वाला वृन्दावन में पैदा हो चुका है । ऐसी मान्यता है कि आकाश में विलीन होती मां की ऊर्जा के तीन टुकड़े हुए, सर वाला भाग जहां गिरा वहाँ आज योगमाया मंदिर है । माँ के पैर विंध्याचल पर्वत पर गिरे जहां आज माँ विंध्यवासिनी का मंदिर है । शेष धड़ आकाश में विलीन हो गया जिसमें माँ दुर्गा,माँ लक्ष्मी और माँ सरस्वती तीनों की ऊर्जा थी ।
Yogmaya Mandir: और पांडव काल ।
जब यह निश्चित हो गया कि कौरवों और पांडवों में युद्ध के सिवा कोई विकल्प नहीं बचा है तो भगवान कृष्ण ने सभी पांडवों से शक्तियाँ अर्जित करने के लिए जगह जगह देवताओं के पास भेजा जहां से उन्होने अस्त्र शस्त्र एकत्र किए, कहते हैं उसके बाद युद्ध प्रारंभ होने से पहले कृष्ण भगवान इस योगमाया मंदिर में आए थे और पांडवों के साथ मिल कर पूजा अर्चना की थी और देवी माँ से यह आश्वासन लिया था कि मां योगमाया जब तक युद्ध चलेगा तब तक युद्ध क्षेत्र में ही रहेंगी ।
ऐसी मान्यता है कि जब जयद्रथ का वध नहीं हो पा रहा था तो उस समय सूर्य को ढक कर सूर्यास्त होने का आभास जो युद्ध क्षेत्र में हुआ था उस में पूरी माया माँ योगमाया की ही थी ।
Yogamaya Mandir : वर्तमान स्वरूप और इतिहास ।

Yogmaya Mandir : का वर्तमान इतिहास सातवीं आठवीं सताब्दी के आस पास से मिलता है । माँ योगमाया तोमर वंश की कुल देवी रहीं हैं । तोमर वंश का शासन आठवीं सताब्दी से 12वीं सताब्दी के बीच रहा है, वर्तमान मंदिर का स्वरूप उसी समय का है । अनंगपाल द्वितीय तोमर वंश के बड़े शासक हुए हैं उन्ही ने महरौली क्षेत्र में ढिल्लिका गाँव बसाया था जो बाद में दिल्ली के नाम से जाना गया अन्नग पाल तोमर के बाद शासन पृथ्वी राज चौहान के पास आया पृथ्वी राज ने भी इस मंदिर को और बड़ा स्वरूप दिया । चौहान की एक बेटी का नाम बेला था जो माँ योगमाया की बहुत बड़ी भक्त थी वो यही से यमुना जी को अर्घ्य दिया करती थी । तोमर वंश का शासन राजस्थान तक था इसीलिए उस समय जो भी निर्माण दिल्ली में किए गये वो लाल पत्थर से ही किए गये । इस मंदिर का निर्माण भी लाल पत्थरों से ही किया गया था जिसके अंश कहीं कहीं अब भी दिखते हैं ।
दिल्ली में जब मुगलों का शासन हुआ तब उन्होने बाकी जगह की मंदिरों की तरह इस मंदिर को भी कई बार तोड़ने की कोशिशें की लेकिन वो कभी भी अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाये । औरंगजेब के सैनिक जब जब मंदिर को तोड़ने आए तो उनके साथ कुछ ना कुछ अनहोनी हो जाती रही और वो थक हार के लौट जाते रहे । आज भी मंदिर अपने अच्छे स्वरूप मे विध्यमान है ।
मंदिर की वर्तमान कमेटी या ट्रस्ट की और आसपास के नागरिकों की भी इस बात के लिए सराहना की जानी चाहिए कि वो अपनी विरासत को इतने अच्छे से संभाल रहे हैं।
Main Festival ; मुख्य त्योहार और उत्सव,फूलवालों की सैर ।
यह उत्सव मंदिर का बड़ा उत्सव है जो हर साल सितंबर अक्तूबर के महीने में मनाया जाता है । इसकी कोई तिथि या तारीख नियत नहीं है इसकी डेट को यहाँ की समिति और प्रशासन के लोग मिल कर तय करते हैं । यह इस बात पर भी निर्भर करता है की फूलों का मौसम कैसा रहता है और बाजार में फूल आसानी से कब उपलब्ध होते हैं ।
यह उत्सव हिन्दू और मुसलमानों के बीच के भाईचारे की भी एक मिसाल है । यह त्योहार मुगलों के समय से मनाया जाता है बीच में अंग्रेजों ने इसे बंद करवा दिया था लेकिन आजादी के बाद नेहरू जी ने इसे फिर से शुरू करवाया !
इस उत्सव या त्योहार के समय मंदिर के पास ही स्थित कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह पर मंदिर की तरफ से फूलों की चादर भेजी जाती है और दरगाह से फूलों के बड़े बड़े पंखे देवी माँ के लिए भेजे जाते हैं ।
यह परंपरा अकबर शाह द्वितीय ( 1806 से 1837 ) के जमाने से शुरू हुई थी जब उनके शहजादे को अंग्रेज़ सरकार ने दिल्ली से सजा के तौर पर इलाहबाद भेज दिया था । उनकी बेगम का रो रो कर बुरा हाल था तब उन्होने मन्नत मांगी थी कि जब उनके शहजादे लौट आएंगे तो बख्तियार काकी की दरगाह पर चादर चढ़ाएंगी । मन्नत मांगने के बाद जब शहजादे वापिस लौट आए तो उन्होने मजार पर चादर चढ़ाने के बाद योगमाया मंदिर में भी पंखे चढ़वाये । उस समय चांदी के पंखे चढ़ाये जाते थे लेकिन अब फूलों के पंखे चढ़ाये जाते हैं । यह उत्सव तभी से चला आ रहा है ।
Yogmaya Mandir : आसपास के दर्शनीय स्थल ।
कुतुबमीनार
जगन्नाथ मंदिर
दिल्ली का लौह स्तम्भ
हौजखास विलेज
छतरपुर मंदिर
Yogmaya Mandir : कैसे पहुंचे ?
यह मंदिर भारत की राजधानी दिल्ली के महरोली क्षेत्र में स्थित है । नजदीक का मेट्रो स्टेशन कुतुबमीनार है जो दिल्ली मेट्रो की Yellow Line मेट्रो से पहुंचा जा सकता है,Yellow Line मेट्रो नई दिल्ली स्टेशन से हर दो मिनट में मिलती है । मेट्रो से बाहर निकलते ही ऑटो मिल जाते हैं जो योगमाया मंदिर 50 रुपये में पहुंचा देते हैं । DTC bus stop महरोली बिलकुल मंदिर के बाहर ही है । दिल्ली भारत की राजधानी होने के कारण सभी देशों से वायु मार्ग द्वारा जुड़ा हुआ है ।
चलते चलते : आज की बात :
Yogmaya Mandir : चार सबसे पुराने मंदिरों में से एक है, पुराने किले के पास के भैरों बाबा, कनॉट प्लेस के हनुमान जी और कालका मंदिर, योगमाया मंदिर के अलावा अन्य तीन और पुराने मंदिर हैं ।
आप नए मंदिरों में जायें लेकिन अपनी पुराने मंदिरों को ना भूलें ये हमारी विरासत ही नहीं बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा के भंडार हैं, जरा सोचिए सैकड़ों साल पहले से यहां पूजा अर्चना होती आई है कितने यज्ञ हुए होंगे कितने संत महात्माओं की यहां चरण रज पड़ी होगी यह सब ऊर्जा आज भी आपको पुराने मंदिरों में महसूस होगी ।
योगमाया मंदिर बहुत विशालता लिए हुए अब अपने अस्तित्व में नहीं है लेकिन जब आप इसके छोटे से परिसर में प्रवेश करेंगे और आप मां के सानिध्य में कुछ देर आंख बंद कर बैठेंगे तो जो आत्मिक शांति आप अनुभव करेंगे उस की कल्पना आप नहीं कर सकते हैं ।
मंदिर सुबह चार बजे खुल जाता है और रात को नौ बजे तक खुला रहता है,बहुत ज्यादा भीड़ भाड़ भी यहां नहीं होती तो आप बड़े आराम से यहां दर्शन कर सकते हैं ।
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सभी धर्मों का सम्मान करें,अपने धर्म पर गर्व करें
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Bahut sunder लेख 🙏🙏